April 18, 2018
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बांसगांव: यहाँ के दुर्गा मंदिर में 12 दिन के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक करते है अपने खून से माँ को तिलक

गोरखपुर: जनपद के बांसगांव क्षेत्र के क्षत्रिय राजपूत नवमी के अवसर पर माँ दुर्गा को अपना रक्त अर्पित कर नौ दिनों की साधना को सफल बनाते हैं। इसके लिए बांसगांव कस्बे का देवी मंदिर ही उनका आराध्यस्थल है। नवजात से लगायत 100 वर्ष तक के लोगों द्वारा रक्त चढाये जाने के लिए काटे गए स्थान पर भभूत (अग्निस्थल की राख ) मल दी जाती है। गांव वालों का मानना हैं कि इससे बच्चों को आज तक कोई बीमारी नहीं हुई है।

बता दें कि गोरखपुर शहर से 40 किमी दूर बांसगांव इलाके के इस दुर्गा मंदिर में यूं तो हर समय भक्तों की भीड़ लगी रहती है, पर शारदीय नवरात्र के नवमी तिथि को यहां पर पूरे इलाके के हजारों क्षत्रियों लोगों का जमावड़ा होता है। जहां पुजारी द्वारा शुभ मुहुर्त की घोषणा के बाद हर व्यक्ति के शरीर से काट कर रक्त निकाला जाता है और मां को चढ़ाया जाता है।

इसमे चाहे नवजात बच्चा हो या फिर 100 साल का बुजुर्ग सभी अपने खून का दान मां को चढ़ाते है। रक्तबलि यहां हर साल देना अनिवार्य माना जाता है। वहीं इस गांव से जुड़े देश-विदेश में रहने वाले श्रीनेत वंश के लोग शारदीय नवरात्र के नवमी के दिन यहां पर आते हैं और मां दुर्गा के चरणों में रक्‍त अर्पित करते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक करीब सौ साल से चली आ रही इस परंपरा में इस क्षेत्र के हर परिवार के पुरुष को रक्त का चढ़ावा अनिवार्य माना जाता है।

बताया जाता है कि जिस लड़के की शादी नहीं होती है उसके एक अंग से खून चढ़ाया जाता है।वहीं शादीशुदा पुरुषों को शरीर के 9 जगहों पर काटा जाता है और रक्त को बेलपत्र के जरिये माता दुर्गा की मूर्ति पर चढ़ाया जाता है।

कई दशकों पहले इस मंदिर पर जानवरों की बलि प्रथा काफी प्रचलित थी ,पर पिछले पचास सालों से यहां के क्षत्रियों ने मंदिर में बलिप्रथा बंद करवा दिया और अब यहां पर उनके खून से मां का अभिषेक होता है। यहां के लोग मानते हैं कि रक्त चढ़ाने से मां खुश होती हैं और उनका परिवार निरोग और खुशहाल रहता है।

सैकड़ों सालों से बांसगाव में इस परंपरा का निर्वाह आज की युवा पी़ढ़ी भी उसी श्रद्धा से करती है ,जैसे उनके पुरखे किया करते थे।सभी का मानना है कि क्षत्रियों का लहू चढ़ाने से मां दुर्गा की कृपा उनपर बनी रहती है। यहां पर रक्‍त बलि देने वालों में कई ऐसे भी लोग हैं,जो डॉक्‍टर हैं, प्रशासनिक अधिकारी हैं। लेकिन परंपरा का निर्वहन वह हर साल यहां पर आकर करते हैं और अपने शरीर की रक्‍तबलि देकर मां दुर्गा को प्रसन्‍न करते हैं।

मंदिर पर अपने रक्त को माँ के चरणों में समर्पित करते एक भक्त ने बताया कि इनके इस भक्ति से माँ दुर्गा इनके व इनके परिवार के ऊपर हमेशा ही अपना आशीर्वाद बनाये रखती है। लोगो के शरीर से किस तरह से खून की धार बह रही है ।लेकिन ये लोग माँ दुर्गा के भक्ति में इतने लीन है कि इनको इस रक्त का कोई परवाह नहीं।

सदियों से चलने वाली इस परम्परा में क्या बच्चे क्या बूढ़े, सभी एक ही रंग में रंग जाते है। एक मासूम बच्चा जिसने अभी दुनिया को ठीक ढंग से देखा भी नहीं उसे भी सदियों की परम्पराओं के चंगुल में फसना पड़ता है। इन मासूम बच्चो को भले ही इस परम्परा के बारे में कुछ नहीं मालुम, बस इतना मालूम है कि खून की बलि देनी है, सो देनी है।

जो माँ बाप अपने बेटे के आँखों में कभी आंसू भी नहीं देख सकते, आज वो अपने बेटे के माथे से खून की धार देख खुश होते है। क्योकि इससे उनकी सदियों की परम्परा कायम रहती है।

इस तरह की भक्ति शायद ही कही देखने को मिलती है। इस गांव का रहने वाले कोई कही भी रहे, लेकिन आज के दिन माता की भक्ति उन्हें अपने पैतृक भूमि पर माँ की चरणों में खीच ही लाती है। खून की ये प्रथा अनोखी ही नहीं अविश्वसनीय भी है। 12 दिन के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक के अंगों से खून निकाल कर माता को चढाई जाती है।

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