February 25, 2018
पूर्वांचल के नायक

ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ, जिहोने हिन्दू समाज की कुरीतियों के खिलाफ चलाया सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला

हरिकेश सिंह
गोरखपुर: एक संत, एक पीठाधीश और एक कुशल राजनेता, जिसने दक्षिण भारत मे अनुसूचित जाति के लोगों द्वारा सामूहिक धर्मांतरण से आहत होकर राजनीति में कदम रखा और सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला अपनाते हुए हिन्दू धर्म मे छुआछूत, ऊँच-नीच के भेदभाव को दूर करने के लिए लगातार सहभोज कार्यक्रम चलाया।

हम बात कर रहे है पूर्वांचल के प्रसिद्ध हिन्दू पीठ गोरक्षनाथ मन्दिर के पूर्व पीठाधीश्वर, पूर्व सांसद और रामजन्म भूमि आंदोलन के अगुआ महंत अवैद्यनाथ की, जिन्होंने हिन्दू धर्म की आध्यात्मिक साधना के साथ सामाजिक हिन्दू साधना को भी आगे बढाया।

ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ का जन्म 28 मई 1921 को ग्राम काण्डी, जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड में श्री राय सिंह बिष्ट के घर हुआ था। उनके बचपन का नाम कृपाल सिंह बिष्ट था। हिमालय और कैलाश मानसरोवर की यात्रा और साधना से शैव धर्म से गहरे प्रभावित कृपाल सिंह बिष्ट पहली बार 1940 में अपनी बंगाल यात्रा के दौरान बाबा निवृति नाथ जी के माध्यम से ब्रह्मलीन दिग्विजय नाथ से मिले।

जहां से वह गोरखनाथ मन्दिर पहुंचे और अपने गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी की सेवा सुश्रुषा करते हुए उनके आशीर्वाद स्वरूप 8 फ़रवरी 1942 को गुरु गोरक्षनाथ की पावन भूमि गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बन गए और इस तरह मात्र 23 साल की अवस्था में श्री कृपाल सिंह बिष्ट से अवैद्यनाथ बन गये।

हालांकि गोरक्षपीठ पर गुरु गोरखनाथजी के प्रतिनिधि के रूप में सम्मानित संत को महंत की उपाधि से अलंकृत किया जाता है। कालांतर में महंत अवेद्यनाथ गोरक्ष पीठाधीश्वर के पद पर आसीन हुए। मन्दिर के इतिहास के मुताबिक इस मंदिर के प्रथम महंत वरदनाथजी महाराज रहे हैं जो गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य थे।

दक्षिण भारत के रामनाथपुरम और मीनाक्षी पुरम में अनुसूचित जाति के लोगों के सामूहिक धर्मातरण की घटना से खासे आहत होते हुए महंत अवैद्यनाथ ने राजनीति में पदार्पण किया। इस घटना का विस्तार उत्तर भारत में न हो इसके लिए महत्वपूर्ण कदम उठाये और राजनीति में रहकर मतान्तरण का ध्रुवीकरण करने के कुटिल प्रयासों को असफल किया।

उन्होंने 1962, 1967, 1974 व 1977 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में तत्कालीन मानीराम विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया और 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर से लोकसभा सदस्य रहे। महंत अवेद्यनाथ ने वाराणसी व हरिद्वार में संस्कृत का अध्ययन किया था। वह संस्कृत से शास्त्री थे। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद से जुड़ी शैक्षणिक संस्थाओं के अध्यक्ष के अलावा वे मासिक पत्रिका योगवाणी के संपादक रहे। योग व दर्शन पर लगातार लिखा।

गोरक्षपीठ से जुड़ी चिकित्सा,शिक्षा और सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रही करीब तीन दर्जन संस्थाओं के अध्यक्ष एवं प्रबंधक थे। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद से जुड़ी शैक्षणिक संस्थाओं के अध्यक्ष के अलावा वे मासिक पत्रिका योगवाणी के संपादक रहे। योग व दर्शन पर आजन्म लिखते रहे।हिंदू समाज की एकता ही उनके प्रवचन के केंद्र में होती थी।

वह मूलत: इतिहास और रामचरित मानस का सहारा लेते थे। श्रीराम का शबरी, जटायु, निषादराज व गिरीजनों से व्यवहार का उदाहरण देकर दलित-गरीब लोगों को गले लगाने की प्रेरणा देते रहे। योग व दर्शन के मर्मज्ञ महंत अवैद्यनाथ के राजनीति में आने का मकसद हिंदू समाज की कुरीतियों को दूर करना और राम मंदिर आंदोलन को गति देना था।

हिन्दू धर्म में ऊंच-नीच दूर करने के लिए उन्होंने लगातार सहभोज के आयोजन किए। इसके लिए उन्होंने बनारस में संतों के साथ डोमराजा के घर जाकर भोजन किया और समाज की एकजुटता का संदेश दिया। 34 वर्षों तक हिन्दू महासभा और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहकर हिंदुत्व को भारतीय राजनीति में गति देने वाले और सामाजिक हितों की रक्षा करने वाले महंत अवैद्यनाथ ने स्वयं को अवसरवाद और पदभार से स्वयं को दूर रखा और इस तरह उन्होंने राजयोग में भी हठयोग का प्रयोग बखूबी किया।

आजन्म विवादों से दूर रहने वाले विरक्त सन्यासी, सज्जन, सरल और सुमधुर और मितभाषी व्यक्तित्व के धनी महंत अवैद्यनाथ ने श्री रामजन्म भूमि आन्दोलन को मात्र गति ही नहीं दिया अपितु एक संरक्षक की भाँती हर तरह से रक्षित और पोषित भी किया।।महंत अवैद्यनाथ ने हिन्दू धर्म की आध्यात्मिक साधना के साथ सामाजिक हिन्दू साधना को भी आगे बढाया और सामाजिक जनजागरण को अधिक महत्वपूर्ण मानकर हिन्दू धर्म के सोशल इंजीनियरिग पर बल दिया।

योगी आदित्यनाथ के हिन्दू युवा वाहिनी जैसे युवा संगठन की प्रेरणा भी कहीं न कहीं इसी सोसल इंजीनियरिग की प्रेरणा रही थी। बाद में महंत अवेद्यनाथ ने गोरखपुर के निवर्तमान सांसद और अब उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को गोरक्षपीठ का न सिर्फ उत्तराधिकारी बनाया बल्कि उन्होंने योगी आदित्यनाथ को 1998 में सबसे कम उम्र का सांसद बनने का गौरव प्रदान किया। बाद में योगी आदित्यनाथ ने हिन्दू युवा वाहिनी का गठन किया जो हिन्दू युवाओं को धार्मिक बनाने के लिए प्रेरणा देती है।

अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में वर्ष 2014 में 97 वर्ष की उम्र में उनका स्वास्थ्य जवाब देने लगा तो उन्हें मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। जहां से काफी इलाज के बाद भी जब वह ठीक न हुए तो वापस उन्हें गोरक्षपीठ लाया गया। जहां उन्होंने 12 सितम्बर 2014 को अपनी आखिरी सांस ली।

ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ को नाथ परंपरा के अनुसार समाधि दी गयी। पुलिस की टुकड़ी ने गार्ड ऑफ आनर दिया तथा मातमी धुन बजायी। पद्यमासन की मुद्रा में उन्हें समाधि की पश्चिम दिशा में बनी समाधि गृह में रखा गया। समाधि में कच्चा रोट,वेद,जनेऊ,अधारी, खप्पर,झोली,चीनी, चावल,घी तथा नारियल पर दीप रखा गया। धूप, घी, लोबान व कपूर से अंतिम पूजा के बाद गोरक्षपीठाधीश्वर महंत आदित्यनाथ ने समाधि गायत्री के साथ सबसे पहले मिट्टी डालकर अंतिम विदाई दी।

ब्रह्मलीन अवैद्यनाथ की स्मृति में महाराजगंज के चौक बाज़ार स्थित महाविद्यालय का नाम गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ महाविद्यालय रखा गया है।

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