April 18, 2018
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हिन्दी के शेक्सपियर कहे जाते थे मोती बीए

हिन्दी  शेक्सपियर मोती बीए निधन

देवरिया: जिले के बरहज तहसील क्षेत्र के ग्राम बरेजी में पंडित राधाकृष्ण उपाध्याय के यहां एक अगस्त 1919 को जन्म लेने वाले मोतीलाल उपाध्याय को हिन्दी साहित्य में उनके योगदान के नाते उन्हें ‘हिन्दी का शेक्सपियर’ कहा जाता है।

1934 में बरहज के किंग जार्ज कालेज से अब हर्ष चन्द्र इंटरमीडिएट कालेज से हाई स्कूल की परीक्षा पास की।1936 गोरखपुर के नाथ चन्द्रवात इंटर कालेज से इंटर की परीक्षा पास करने के बाद 1939 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गये। इस दौरान वे विभिन्न हिन्दी समाचार पत्रों आज, आर्यवर्त, संसार आदि पत्रों में सहायक सम्पादक के रूप में कार्य किया।

उसके बाद वे हिन्दी फिल्मों में अभिनय गीत लिखने के क्षेत्र में आ गये। नदियां के पार फिल्म के गीत से उनकी व्यस्तताएं बढ़ गयीं उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत लिखे। उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं ‘सुभद्रा (1946)’, ‘भक्त ध्रुव(1947)’, ‘सुरेखा हरण(1947)’, ‘सिंदूर(1947)’, ‘साजन(1947)’, ‘रामबान(1948)’,’राम विवाह (1949)’, और  ‘ममता (1952)’।

साजन में लिखा उनका एक गीत ‘हमको तुम्हारा है आसरा तुम हमारे हो न हो’ अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय रहा। मोती बीए को फ़िल्मों में काम की कमी नहीं थी। उनके लिखे गीतों को शांता आप्टे, शमशाद बेगम, गीता दत्त, लता मंगेशक, मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, और ललिता देवलकर जैसे गायकों ने स्वर दिये। लेकिन उन्हें एहसास होने लगा था कि मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया में सम्मान की रक्षा के साथ वहां अधिक समय तक टिक पाना संभव नहीं होगा। और एक दिन अचानक उन्होंने फ़ैसला किया वो अपने घर लौट जाएंगे।

फिर यही हुआ। 1952 में मुम्बई से लौटकर वे देवरिया के श्रीकृष्ण इंटरमीडियेट कॉलेज में इतिहास के प्रवक्ता के रूप में पढ़ाने लगे। मुम्बई में रहने के दौरान उनकी अंतिम फ़िल्म ममता थी। कुछ सालों बाद जब चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन, सुजीत कुमार और कुछ दूसरे कलाकारों ने भोजपुरी फ़िल्मों के निर्माण की गति को तेज़ किया तो मोती बीए फिर याद किये गए।

मोती जी ने कई भोजपूरी फ़िल्मों ‘ई हमार जनाना’ (1968), ठकुराइन (1984), गजब भइले रामा (1984), चंपा चमेली (1985), ममता आदि में गीत लिखे। 1984 में प्रदर्शित गजब भइले रामा में उन्होंने अभिनय भी किया। यह आखिरी फ़िल्म थी, जिससे मोती जी किसी रूप में जुड़े।

देवरिया में अध्यापन के दौरान मोती जी साहित्य सृजन में लगे रहे। उन्होंने शेक्सपियर के सानेट्स का हिंदी में सानेट्स की शैली में ही अनुवाद किया। कालीदास के संस्कृत में लिखे मेघदूत का भोजपूरी में अनुवाद किया इसेक अलावा हिंदी में 20 पुस्तकें और उर्दू में शायरी के तीन संग्रह ‘रश्के गुहर’, ‘दर्दे गुहर’ और ‘एक शायर’ की रचना की।

मोती बीए जी अंतिम सांस तक हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिये लगे रहे।90 वर्ष की अवस्था में मोती बीए जी 18 जनवरी 2009 को परलोक को सिधार गये।

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