April 18, 2018
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जब अंग्रेज अफसर ने टेके घुटने तो बिछ गयीं पटरियाँ, गोरखपुर जंक्शन पर शहीद बाबा का चमत्कारी मजार

दरगाह शरीफ गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर लगभग

गोरखपुर: बात उन दिनों की है जब गोरखपुर रेलवे यार्ड में पटरियां बिछाई जा रही थी। किन्तु पूर्वी केबिन के पास एक जगह सुबह-शाम पटरियां अपने आप हट जाती थी।आखिर ऐसा क्यों हो रहा था। ये था पटरियों के बीच एक बाबा की दरगाह का करिश्मा। गोरखपुर जंक्शन पर रेलवे यार्ड में रेलवे की पटरियों के बीच में बसे चमत्कारी बाबा दरगाह शरीफ गोरखपुर, कहते है जिनकी मर्जी से ही इस यार्ड में पटरियाँ बिछ सकी थी। तकरीबन 200 साल पहले से बसा बाबा का ये मजार। कौन हैं ये बाबा, कहा से आये ,ये किसी को नही मालूम। लेकिन बाबा के दर से आज तक कोई खाली नही गया, शायद यही वजह है, कि यहां बाबा के दर पर सभी धर्मों के लोग आते है और अपनी बिगड़ी सवारने को बाबा से अर्जी लगाते है।

कहते हैं कि दुनिया के कण-कण में भगवान और अल्लाह का वास होता है और समय समय पर ये अपने होने का एहसास भी कराते है। एक ऐसे ही बाबा का मजार है गोरखपुर रेलवे स्टेशन के पूर्वी यार्ड स्थित रेल पटरियों के बीच में जिसका हर कोई लोहा मानता है। बताते हैं कि इस मजार को इन पटरियों के बीच से हटाने की हर मुमकिन कोशिस की गई, लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी और जब बाबा के लिए जगह छोड़ कर पटरियां बिछाई गई तो अपने आप पटरिया बिछ गई।

कौन हैं ये बाबा, आज हम आपको बतायेंगे, रेलवे के लाइन वाले बाबा के चमत्कारी मजार के बारे में हजरत मूसा शाह शहीद रहमतुल्ला अलैह, और हजरत मंगल शाह शहीद रहमतुल्ला अलैह ये दो नाम ऐसे है, जिन्हें अंग्रेजो के साथ-साथ यहा के आस पास के रहने वाले लोग कभी नहीं भूल पाए।ये वो नाम है जिनके चमत्कार से अंग्रेजो ने भी घुटने टेक दिए। इनका दरगाह शरीफ गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर लगभग 200 वर्ष पुराना है।

गोरखपुर में रेलवे शहीद बाबा के नाम से आज ये जाने जाते हैं, जब ब्रिटिश सरकार (अंग्रेज) सन 1930 में गोरखपुर में रेल की पटरिया बिछा रही थी, तब यह लोग इनके मजार शरीफ के ऊपर से रेल की पटरियां बिछा देते थे और जब सुबह आते तो रेल की पटरियां उखडी नजर आती थी। अंग्रेज लगभग 1 सप्ताह तक इनके मजार शरीफ पर रेल की पटरिया शाम तक बिछाते थे और सुबह को आते थे तो रेल पटरी यहां अपने आप उखड़ी रहती थी।

उस समय जो रेल का अधिकारी था, उसने बाबा यानी हजरत मूसा शाह शहीद रहमतुल्ला अलैह का सपना देखा तो उन्होंनेे उसे बताया कि मजार शरीफ की जगह छोड़कर रेल की पटरियां बिछाए, फिर दुसरे दिन ऐसा ही उस अफसर ने किया, तब जाकर यहा रेलवे की पटरिया बिछ पाई, तब से ही इस दरगाह शरीफ के खादिम मरहूम बाहर अली शाह अल्वी ने सन 1964 ईस्वी तक दरगाह शरीफ की देखभाल की। उनके बाद इनके साहबजादे खादिम मरहुम मकबूल अहमद शाह अली ने 3 फरवरी 2016 तक आपके दरगाह शरीफ की देखभाल की और इनके बाद इनके साहबजादे खादिम जनाब तुफैल अहमद शाह अल्वी और इनके साहबजादे हाफिज जुबेर अहमद, सोहेल अहमद, गुफरान अहमद, सुफियान अहमद, उबेद अहमद दरगाह शरीफ की देखभाल कर रहे हैं।

इनके दरगाह शरीफ के पत्थर पर अपने आप अल्लाह मोहम्मद लिखा हुआ है, जो की आज भी मौजूद है और इस दरगाह शरीफ शहर गोरखपुर में हिंदू मुस्लिम सिख की एकता का प्रतीक जाना जाता है। साथ ही उन सफेद पोस नेताओं के लिए भी करारा जबाव भी है। जो अपनी राजनीती को चमकाने के लिए एक भाई को दुसरे भाई से लड़ानेे का काम करते है।

किसी ने सच ही कहा है, कि अल्ला और भगवान को बाटने वाला इन्शान ही है, और उनमे आस्था रखने वाला भी इन्शान, गोरखपुर में बाबा का ये मजार भले ही पटरियों के बीच में है, और लोग जान जोखिम में डाल कर रेलवे लाइन को क्रास कर बाबा के दर पर अर्जी लगाने जाते है, और इस दर पर हिन्दू-मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मो के लोग आते है, और आज ये मजार कौमी एकता का प्रतीक बनता जा रहा है।

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