April 17, 2018
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गोरखपुर उपचुनाव: चुनाव तिथि घोषित, प्रत्याशी चयन में भाजपा सहित सभी दलों में उहापोह की स्थिति

गोरखपुर उपचुनाव

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: आखिर लम्बे इंतजार के बाद गोरखपुर उपचुनाव की घोषणा हो ही गयी। सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ सहित समूची पार्टी के लिए यह सीट कितनी महत्वपूर्ण है यह बात किसी से छुपी नहीं है। वहीँ विपक्षी दलों के लिए भी इस लोक सभा सीट का बहुत ज्यादा महत्व इसलिए है क्योंकि उन्हें पता है कि अगर इस सीट पर अगर भाजपा को घेर पराजित कर दिया तो 2019 आम चुनाव से पहले केंद्र और राज्य दोनों की सत्त्ता के लिए को यह बड़ा झटका होगा।

खैर यहाँ कौन जीतेगा कौन हारेगा यह तो 14 मार्च को पता चलेगा, लेकिन फिलहाल तो ऐसा लगता है कि इस प्रतिष्ठित गोरखपुर उपचुनाव लोक सभा सीट पर किस को अपना उम्मीदवार बनाये इसको लेकर सभी पार्टियों में उहापोह की स्थिति है। अब तिथि की घोषणा हो जाने के बाद एक महीने उपचुनाव के लिए बचे हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि पार्टियों के लिए ज्यादा समय भी नहीं है।

बाकि पार्टियां तो इस बात की जुगत भिड़ाने में लगी होंगी कि कौन सा प्रत्याशी उतारा जाए जो योगी के इस गढ़ में भाजपा को टक्कर दे सके। लेकिन क्या कारण है कि अभी तक केंद्र और राज्य दोनों जगह सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। कहीं गोरखपुर उपचुनाव में हुई करारी शिकस्त के कारण पार्टी आलाकमान सकते में तो नहीं है। यही कारण है कि लगातार आठ बार गोरखपुर सीट पर काबिज रहने के बाद भी भाजपा इस सीट पर अपने प्रत्याशी का फैसला अभी तक नहीं कर पायी है।

कायदे से तो पार्टी को उम्मीदवार की घोषणा बहुत पहले कर मैदान में उतर अन्य पार्टियों से बड़ी बढ़त बना लेनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा क्या हो गया है कि रोज-रोज नए नए नामों के सामने आने के बाद भी पार्टी अभी तक किसी निर्णय पर नहीं पंहुच पायी है। भाजपा के लिए यह उहापोह की स्थिति शायद इसलिए बनी है क्योंकि 1989 के चुनाव के बाद यह पहला मौका होगा जब गोरक्ष पीठ को कोई महंत पार्टी की तरफ से मैदान में नहीं होगा। ऐसे में अगर समूचे विपक्ष ने एक होकर अपना प्रत्याशी उतार दिया तो भाजपा के लिए मुश्किल तो जरूर खड़ी हो जाएगी।

गोरखपुर सीट के साथ भाजपा के साथ एक समस्या और यह ही कि यहाँ प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए सूबे के मुखिया और गोरक्षपीठाधीस्वर योगी आदित्यनाथ की पसंद को दरकिनार आसान नहीं होगा। योगी चाहेंगे की यहाँ जा भी राज करे उनके खड़ाऊं को गद्दी पर हमेशा रख कर ही राज करे। मतलब यह कि योगी आज सूबे के मुखिया है, कल हो सकता है कि राजनीतिक परिस्थितयां बदल जाएँ और कोई और मुख्यमंत्री बन जाए। योगी जानते हैं कि उनके लिए गोरखपुर सांसद की सीट स्थायी है जबकि मुख्यमंत्री के पद का कोई ठिकाना नहीं है। क्या पता 2019 में भाजपा को कोई झटका लग जाए और उनके हाथ से सीएम की कुर्सी जाती रहे।

ऐसे में योगी यही चाहेंगे कि यहाँ से पार्टी का उम्मीदवार वही हो जिसके नाम पर वो मुहर लगाएं। इससे उनके भविष्य की राजनीति में भी आसानी होगी और बुरे समय में आलाकमान पर दबाव बनाने के लिए एक सुरक्षित सीट भी हाथ में होगी।

वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष के लिए तो यह सीट जितनी वैसे ही मुश्किल है। ऊपर से अगर एक प्रत्याशी नहीं उतारा तो उन्हें भी पता है कि यहाँ भाजपा को हराना तो दूर लड़ाई में भी नहीं रहेंगे। विपक्ष भी अपने तरफ से रोज-रोज नए नामों को उछाल रहा है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो रोज अपनी रूठी बुआ को मनाने के लिए अपनी तरफ से हर संभव कोशिश कर रहे हैं लेकिन बुआ हैं की मानती ही नहीं। मान भी जाएँ तो आखिर कैसे। इन्ही सपाइयों ने तो उन्हें मौत के मुंह में पंहुचा दिया था। मायावती के लिए गेस्ट हाउस काण्ड को भूलना आसान नहीं होगा भले ही उनके दुश्मन नंबर एक मुलायम सिंह यादव अब अपनी ही पार्टी में दरकिनार कर दिए गए होंगे।

वैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। मायावती अब राज्य सभा की सदस्य नहीं हैं। बसपा उत्तर प्रदेश में इतनी बुरी हालत में है कि उनका उच्च सदन में जाना भी असंभव है। अब अगर उन्हें राज्य सभा में वापस जाना है तो किसी न किसी का सहारा तो लेना ही पड़ेगा। और यहीं पर विपक्ष के एक होने की संभावनाएं भी पैदा हो रही है। फूलपुर लोक सभा सीट भाजपा के लिए कभी आसान नहीं रही। आजादी के बाद भाजपा ने यहाँ मात्र एक बार जीत दर्ज की जब 2014 में यहाँ से वर्तमान उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने यह सीट भाजपा की झोली में डाली दी। यहाँ पर शुरूआती दौर में कांग्रेस का तो बाद में समाजवादी पार्टी का कब्ज़ा रहा है। अगर फूलपुर से विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में मायावती उतरती हैं तो इस बात की सम्भावना बढ़ जाएगी की गोरखपुर सपा की झोली में चला जाये और यहाँ से भी एक ऐसा उम्मीदवार सामने आये जो भाजपा को हरा सके।

खैर यह तो सिर्फ सम्भावनायें हैं। क्या होगा क्या नहीं, यह तो वक़्त बताएगा। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि चुनाव आयोग ने बारात तो सजा दी लेकिन अभी तक पार्टियां अपने दूल्हे का ही चयन नहीं कर पायी हैं।

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