April 18, 2018
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गोरखपुर लोक सभा: पहली बार 1962 के चुनाव में मंदिर ने दी थी दस्तक

गोरखपुर लोक सभा

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: सदर लोक सभा सीट पर 11 मार्च को निर्धारित उपचुनाव के लिए यूँ तो अभी तक किसी पार्टी ने अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है लकिन तैयारी तो सभी दलों ने बहुत पहले ही शुरू कर दी थी। देश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली इस सीट पर भाजपा ने भी अभी तक अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है।

इस सीट पर अब तक सबसे ज्यादा 32 साल तक मंदिर का कब्ज़ा रहा है। इस सीट पर गोरखनाथ मंदिर का ही दबदबा रहा है। यहाँ से गोरखनाथ मंदिर के तीन महन्त 10 बार सांसद चुने जा चुके हैं। इस सीट से महन्त दिग्विजय नाथ एक बार, महन्त अवैद्यनाथ चार बार और महन्त योगी आदित्यनाथ पांच बार सांसद चुने जा चुके हैं।

आपको बता दें कि पहली बार गोरखपुर लोक सभा सीट से महंत दिग्विजयनाथ ने चुनाव लड़ा था। 1962 के आम चुनाव में गोरखनाथ मंदिर के तत्कालीन महंत दिग्विजय नाथ ने चुनाव में दस्तक दी थी। महंत दिग्विजय नाथ हिंदू महासभा के टिकट पर मैदान में उतरे थे। हालांकि उन्हें अपने पहले ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। उस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के सिंहासन सिंह को कड़ी टक्कर तो दी थी लेकिन 3,260 वोटों से हार गए।

हालांकि पांच साल बाद 1967 के चुनाव में निर्दल मैदान में उतर कर दिग्विजय नाथ ने कांग्रेस के विजय रथ को रोक दिया। उस चुनाव में गोरक्ष पीठ के महंत दिग्विजय नाथ ने 42,000 से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की। 1969 में दिग्विजय नाथ का निधन हो गया, जिसके बाद 1970 में उपचुनाव हुआ, जो गोरखपुर लोक सभा सीट पर पहला उपचुनाव था। 1970 में हुए उस उपचुनाव में दिग्विजय नाथ के उत्तराधिकारी और गोरक्षपीठ के तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और पहली बार सांसद बने।

हालांकि उपचुनाव के मात्र एक वर्ष बाद 1971 में हुए चुनाव में सीएम योगी आदित्यनाथ के गुरु निर्दलीय उम्मीदवार अवैद्यनाथ को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस के नरसिंह नरायण पांडेय चुनाव जीत कर संसद पंहुचे थे। उसके बाद लगातार तीन चुनावों में यहाँ से एक बार भारतीय लोक दल तो वहीँ दो बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की।

1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में भारतीय लोकदल के हरिकेश बहादुर ने यहाँ से जीत दर्ज की। पिछले चुनाव में अवैधनाथ को पटखनी देने वाले कांग्रेस के नरसिंह नरायण पांडेय को इस चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। अवैद्यनाथ इस चुनाव में लड़े ही नहीं थे।

1980 के में यहाँ एक बार फिर कांग्रेस ने वापसी करते हुए जीत दर्ज की। 1977 में लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ जीत दर्ज करने वाले हरिकेश बहादुर ने इस बार कांग्रेस का दामन थाम लिया था। और वो लगातार दूसरी बार सांसद बने। 1984 में इंदिरा लहर में इस सीट पर फिर कांग्रेस ने जीत दर्ज की। लोकसभा चुनाव से पहले हरिकेश फिर से लोकदल में चले गए, वहीँ कांग्रेस ने मदन पांडेय को चुनाव लड़ाया। मदन पांडेय ने हरिकेश बहादुर के जीत को रोक दिया।

1984 के बाद इस सीट पर हिंदूवादी दलों के अलावा किसी को जीत नसीब नहीं हुई। 1989 में एक बार फिर गोरखनाथ मंदिर के मंहत अवैद्यनाथ फिर से चुनावी मैदान में उतर गए और हिंदू महसभा के टिकट पर अवैद्यनाथ दूसरी बार सांसद बने। 1991 की रामलहर में अवैद्यनाथ बीजेपी में शामिल हो गए और एक बार फिर इस सीट से जीत दर्ज की थी। 1996 में अवैद्यनाथ यहाँ से लगातार तीसरी बार सांसद बने।

1998 में से अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी युवा योगी आदित्यनाथ चुनाव मैदान में उतरे पहली बार सांसद बने। योगी ने एक कड़े मुकाबले में समाजवादी पार्टी के जमुना निषाद को लगभग 26000 वोटों से हराया। योगी को इस चुनाव में जहाँ 42.62 प्रतिशत मत के साथ 2,68,428 वोट मिले थे तो वहीँ जमुना निषाद को 38.46 प्रतिशत मतों के साथ 2,42,222 वोट मिले थे। 1998 में योगी यहाँ से जीत दर्ज कर सबसे कम उम्र के सासंद बने।

उसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 में लगातार पांच बार योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर लोक सभा सीट पर जीत दर्ज की। 19 मार्च 2017 को प्रदेश की कमान सम्हालने के बाद 21 सितम्बर 2017 को योगी ने संसद की सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया। वैधानिक रूप से उन्होंने सीएम बनने के बाद 8 सितम्बर को विधान परिषद सदस्यता ग्रहण की। अब योगी आदित्यनाथ के इस्तीफा देने के बाद से ही यह सवाल खड़ा है कि उनकी जगह इस सीट से चुनाव कौन लड़ेगा?

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