April 18, 2018
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गोरखपुर उपचुनाव: जहां भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर, वहीं विपक्षियों में एकजुटता का अभाव

गोरखपुर लोकसभा सीट जहां भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर, वहीं विपक्षियों में एकजुटता का अभाव

 

हरिकेश सिंह
गोरखपुर: निवर्तमान सांसद योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने से रिक्त पड़ी गोरखपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव की घोषणा हो गई है। 11 मार्च को उपचुनाव होगा और 14 मार्च को परिणाम आयेगा। इस उपचुनाव में एक तरफ भाजपा जहां पूरे दमखम से परिणाम अपने पक्ष में लाने की कोशिशों में है तो दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियां अपनी ढपली अपना राग अलापने में मस्त हैं।

गोरखपुर संसदीय सीट पर उपचुनाव की तिथि घोषित होने के चार दिन बीत जाने के बाद भी किसी भी दल ने अपने प्रत्याशी का नाम घोषित नही किया है। हालांकि जब योगी आदित्यनाथ ने इस सीट पर त्यागपत्र दिया था तो कमोबेश सभी विपक्षी दलों ने यहां पर संयुक्त रूप से भाजपा को टक्कर देने की बातें की थी। लेकिन चुनाव तिथि घोषित होते ही सारे वादे इरादे पानी मे बह गए। जिसकी पुष्टि भी बीते दिनों जनपदीय दौरे पर आए सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने यह कहते हुए कर दी कि कांग्रेस से दोस्ती तो रहेगी,लेकिन चुनाव में साइकिल अपनी बदौलत ही दौड़ेगी।

नतीजन सभी दल अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं।ऐसे में विपक्षी दलों द्वारा अलग-अलग सत्ताधारी दल के प्रत्याशी को चुनौती देना समझ से परे है। अब रही बात चुनाव में उतरने वाले दलों के प्रत्याशियों की तो अभी तक सभी दल एक दूसरे की बाट जोहते ही दिख रहे हैं।

यूँ तो चर्चाओ के मुताबिक बीजेपी इस सीट पर सम्भवतः 18 की शाम से 19 की सुबह तक अपना पत्ता खोलेगी, जिससे इस पार्टी में तमाम नेताओं के नाम पर हवाई चर्चाएं ही चल रही हैं। हालांकि सूत्रों के अनुसार पार्टी ने अपना प्रत्याशी तय कर लिया है और जल्द ही उसकी घोषणा भी हो जाएगी।

अब बात करें विपक्षी दलों की तो पूर्वांचल में दमदार लड़ाई का दावा करने वाली प्रमुख पार्टी समाजवादी पार्टी भी अभी तक प्रत्याशी का चयन नही कर सकी है। हालांकि इस पार्टी से चर्चाओं के मुताबिक स्व.यमुना निषाद की पत्नी पूर्व विधायक श्रीमती राजमती देवी, पूर्व विधायक रामभुआल निषाद समेत कुछ अन्य पिछड़ी जाति के नेताओं के नामो पर बहस चल रही है। लेकिन धरातल पर अभी तक किसी की जोरदार प्रत्याशिता नही आ सकी है।

जबकि कांग्रेस के पास पार्टी के जिला संगठन द्वारा हाईकमान को भेजे गए पांच नाम है,वहां का भी आलम कुछ ऐसा ही दिख रहा है।रही बात बसपा की तो इस पार्टी ने पहले ही उपचुनाव में न उतरने की बात कहकर वाक ओवर दे दिया है।

वैसे भी यह सीट जातिगत समीकरण पर सधी हुई है। जिसे देखते हुए सभी पार्टियां अपने स्तर से पिछड़े तबके के ऐसे कैंडिडेट को मैदान में उतारेंगे,जो अपनी जाति को साधने के साथ ही अन्य तबके में भी लोकप्रिय हो। क्योंकि इस लोकसभा सीट के प्रभावित विधानसभा क्षेत्रों में निषाद, मुसलमान व यादव मतदाताओं की बाहुल्यता है।पिछले दिनों तक आमतौर पर सपा की मंशा थी कि सभी गैर भाजपाई दलों का समर्थन हासिल कर भाजपा को मात दी जाए। यह बात ओबीसी आर्मी के सम्मेलन में एकजुटता देखकर कुछ विश्वसनीय बनती नजर भी आयी। लेकिन बाद में सभी समीकरण धराशायी होते नजर आ रहे हैं।

अगर कोई भी पार्टी इस सीट पर जातिगत समीकरण सहेज लेती है तो आश्चर्यजनक परिणाम आ सकते है क्योंकि गोरखपुर लोकसभा सीट में सबसे ज्यादा निषाद मतदाता है जिनकी संख्या करीब 4 लाख है। दो विधान सभाओं पिपराइच और गोरखपुर ग्रामीण में सबसे ज्यादा निषाद मतदाता हैं।

एक अनुमान के मुताबिक इस लोकसभा क्षेत्र में करीब 1,50,000 मुस्लिम, 1,50,000 ब्राह्मण,  1,30,000 राजपूत, 1,60,000 यादव , 1,40,000 सैंथवार और वैश्य व भूमिहार मतदाता करीब एक लाख की संख्या में है। ऐसे में जो भी पार्टी इन ज्यादा जातियों को साधने वाला प्रत्याशी उतारेगी जीत का सेहरा उसी के सर बंधेगा।

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