April 18, 2018
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क्या समर्थित दलों के वोट बैंक से हो पायेगा सपा का बेड़ा पार!

हरिकेश सिंह
गोरखपुर: जिले में लोक सभा उपचुनाव में अब मुख्य प्रतिस्पर्धा सपा बनाम भाजपा और कांग्रेस की है। जिसमे कांग्रेस अपने वजूद की लड़ाई खुद लड़ रही है। खास बात यह कि सत्तासीन भाजपा को शिकस्त देने के लिए बीते कुछ समय में बसपा एवम कई छोटी पार्टियां सपा को समर्थन देने की बात करके अपने मतदाता वर्ग को इस पक्ष में लाने की कोशिश में जुट भी गईं हैं। लेकिन क्या, वास्तव में इन छोटे दलों और बसपा के समर्थन से बीजेपी की सेहत पर असर पड़ेगा।

गौरतलब है कि विगत कई वर्षों से गोरक्षपीठ के कब्जे में रही गोरखपुर सदर संसदीय सीट पर इस समय चुनावी घमासान छिड़ा हुआ है।जिसमे अपने विजय रथ को कई राज्यों से होते हुए अब यूपी के उपचुनाव में अश्वमेध बनाने के लिए बीजेपी अपने तरकस से सभी तीर निकाल चुकी है,और ये तीर कहीं न कहीं कारगर साबित भी हो रहे है।जब कि विपक्ष में इस पार्टी से दो दो हाथ को तैयार समाजवादी पार्टी भी हर तरह के हथकण्डे अपनाने में जुट गई है।

इसी क्रम में सर्वप्रथम पिछले दो दशक से उसकी जानी दुश्मन रही बसपा ने भी सारे गिले शिकवे दूर कर अपना वोट बैंक इस चुनाव में उसे सौंपने का निर्णय लिया है।इसी राह पर कई अन्य दल,जैसे राष्ट्रीय लोकदल, कम्युनिस्ट पार्टी, राजभर संगठन,पीस पार्टी और निषाद पार्टी भी चल पड़ी हैं।इन छोटी पार्टियों के समर्थन से हालांकि सपा खुद को विजय की संभावनाओं के प्रति आश्वस्त मान रही है,किन्तु यह कहां तक सम्भव है कि जिस बसपा का वोट बैंक खांटी दलित समाज माना जाता है, उसी के आरक्षण में दलित होने का प्रमाण पत्र मांग कर सेंध लगाने वाले निषाद समुदाय को दलित वर्ग वोट देगा।

दूसरी चीज ये कि जब प्रदेश में बसपा का शासन था, तो खांटी सपाई उत्पीड़ित हुए थे और इसके उलट जब सपा सत्ता में आई तो बसपाई भी इसके राग द्वेष का शिकार हुए,तो क्या सम्भव है कि ऊपरी आदेश को सिरोधार्य करते हुए जमीनी कार्यकर्ता अपने पुराने जख्मों को भूलकर वोटिंग करेंगे। अब रही बात सभी दलों की पसंद बने मुस्लिम वर्ग की तो, पहले यह वर्ग कांग्रेस के पाले में था, जिसमे बाद के दिनों में धीरे धीरे सपा, बसपा और पीस पार्टी ने सेंधमारी कर लिया,जिसे देखते हुए इस वर्ग का कुछ प्रतिशत मत बीजेपी ने भी अपने कुछ विशेष कार्यों के चलते अपने हिस्से में कर लिया।

फिलहाल मुस्लिम वर्ग का वोट भी एकतरफा न गिरकर कई हिस्सों में बंटेगा।इससे भी बड़ी बात ये कि जिस पार्टी, वर्ग के जो मतदाता अपना परम्परागत पार्टी का चुनाव चिन्ह हमेशा से उपयोग करते आये हैं,उनके लिए समर्थित दल का चुनाव चिन्ह अपने जेहन में याद रखना बहुत ही दुष्कर कार्य साबित होगा।

जबकि इसके विपरीत भाजपा संसदीय क्षेत्र के सभी विधानसभा क्षेत्र में अपने बड़े नेताओं, मंत्री और स्थानीय पदाधिकारियों सहित बूथ लेबल के नेताओं को भी लगाकर जातिगत और क्षेत्रीय आधार पर पूरा समीकरण बदलने पर आतुर है।अब ऐसे में कहां तक सम्भव है कि अन्य दलों के समर्थन से मिलने वाले वोट से सपा को फायदा होगा।

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