April 18, 2018
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गोरखपुर की हार से भाजपा में योगी विरोधी समानांतर सत्ता केंद्र को तगड़ा झटका, सीएम की साख को भी लगा बट्टा

गोरखपुर की हार से भाजपा में योगी विरोधी समानांतर सत्ता केंद्र को तगड़ा झटका, सीएम की साख को भी लगा बट्टा 

गोरखपुर: जो बात ऐसा लगता था कि शायद केवल सपने में ही सोची जा सकती थी गोरखपुर में आज वो प्रत्यक्ष हो गया। जी हाँ 30 साल से भाजपा के इस अभेद्य दुर्ग को समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी की मदद से भेद दिया। यूँ तो इस उपचुनाव में पहली बार सीधे रूप में मंदिर के महंत की सहभागिता नहीं थी लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस हार ने सूबे के मुखिया और गोरक्षपीठाधीस्वर योगी आदित्यनाथ की साख पर खूब बट्टा लगाया है। अब इस हार की समीक्षा होगी और उसका क्या परिणाम होगा यह तो वक़्त बताएगा लेकिन दबी जबान में लोग यह तो कह ही रहे हैं कि पार्टी प्रत्याशी की इस हार में योगी की जीत भी छुपी हुई है।

गोरखपुर लोकसभा सीट गवाने से भाजपा और इस समय प्रदेश की राजनीति के मुख्य केंद्र गोरखपुर में योगी विरोधी समानांतर सत्ता केंद्र को एक तगड़ा झटका लगा है। यह बात किसी छुपी नहीं है कि उपचुनाव में पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशी उपेंद्र शुक्ल सीएम योगी की पसंद नहीं थे। चुनाव आयोग द्वारा उपचुनाव की घोषणा के बाद से ही भाजपा प्रत्याशी के नाम को लेकर उठापठक शुरू हो गयी थी। योगी की पहली पसंद मेयर के चुनाव में सीताराम जायसवाल के हाथों पिछड़ चुके धर्मेंद्र सिंह थे तो वहीँ योगी विरोधी खेमा उपेंद्र शुक्ल के नाम पर अड़ा रहा।

उसके बाद कई और जाने पहचाने नाम जिनमे बॉलीवुड स्टार रवि किशन शुक्ला, पूर्व गृह राज्यमंत्री चिन्मयानंद, हरी प्रकाश मिश्रा और गोरखनाथ मंदिर मुख्य पुजारी योगी कमलानाथ के नाम उछले लेकिन अंत में टिकट मिला तत्कालीन क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल को। गोरखपुर की राजनीति को समझने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि उपेंद्र शुक्ल कभी भी योगी के गुड बुक में नहीं रहे। फिर भी योगी ने केंद्रीय नेतृत्व की बात स्वीकारते हुए उपेंद्र शुक्ल के नाम पर हामी भर दी। उसके बाद शुरू हुआ चुनाव प्रचार का दौर। योगी ने अपने तरफ से इसमें कोई कर कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कई जनसभाएं की। लेकिन फिर भी पार्टी के प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा।

इस हार ने भाजपा में गोरखपुर में बन रहे योगी विरोधी सामानांतर सत्ता केंद्र को तगड़ा झटका दिया है। यदि उपेंद्र शुक्ल चुनाव जीत जाते तो केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री का कद तो ऊँचा होता ही साथ ही वो अपने आपको और मजबूती से योगी के एक विकल्प के रूप में स्थापित कर पाते। उपेंद्र शुक्ला को शिव प्रताप के खेमे का माना जाता है। ऐसे में यदि उपेंद्र शुक्ल यह सीट जीतते तो उसका सीधा लाभ शिव प्रताप को जाता।

अब चुनाव हार जाने के बाद शिव प्रताप को केंद्रीय नेतृत्व के कोपभाजन का शिकार भी बन सकते हैं। शिव प्रताप की सक्रिय राजनीति में वापसी 14 साल के बनवास के बाद अप्रत्यशित रूप से राज्य सभा के सदस्य के रूप में हुई। बाद में देवरिया सांसद कलराज मिश्रा की विदाई के बाद ब्राह्मण वोट को सहेजे रखने के लिए शिवप्रताप केंद्रीय मंत्री बनाये गए। शिव प्रताप शुक्ला को पहले राज्यसभा का टिकट देने, उन्हें केंद्र में मंत्री पद देने या महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश भाजपा की कमान सौपना ब्राह्माण वोट को सहेजने की ही एक कवायद थी। हालांकि इस हार के बाद शिव प्रताप मंत्री तो बने रहेंगे लेकिन उनका कद तो पार्टी में घटनेगा ही।

वहीँ दूसरी तरफ खुद प्रत्याशी ना रहते हुए भी यदि योगी आदित्यनाथ सपा-बसपा के गठबंधन के बाद भी इस चुनाव में जीत दिला देते हैं तो क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में उनके हैसियत न सिर्फ बरकरार रहती बल्कि और चमकदार होती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिस सीट पर गोरक्ष पीठ का 30 सालों तक राज रहा वहां पर उपचुनाव में हार योगी और उनके एक साल के कार्यकाल पर भी प्रश्न खड़े करता है।

स्थानीय स्तर पर एक बात यह चल रही है कि उपेंद्र शुक्ल की प्रत्याशिता को योगी आदित्यनाथ ने तो स्वीकार कर लिया लेकिन उनके समर्थकों ने नहीं स्वीकार किया। बताया जाता है कि श्री शुक्ल के नामा की घोषणा के बाद ही योगी के खांटी समर्थक निरूत्साहित हो गए। चुनाव प्रचार में भी बेमन से ही लगे रहे। एक बात और जो गोरखपुर में बीते चुनावों में देखी जाती थी वो थी अंतिम समय में धर्म के नाम पर मतों का ध्रुवीकरण। धर्म के नाम का ध्रुवीकरण जाति पर भारी पड़ जाता था। एक दो चुनावों में ऐसे मौके आएं जब योगी की सीट भी खतरे में पड़ी दिखाई दी है और उस समय मंदिर की प्रतिष्ठा ने ही योगी को डूबने से बचाया था।

1998 में योगी आदित्यनाथ द्वारा गठित हिंदू युवा वाहिनी भी नीचले स्तर पर माहौल बनाने में बहुत काम आता था। 2017 के विधान सभा चुनाव के बाद और योगी के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद हिंदू युवा वाहिनी का निष्क्रिय होते जाना भी उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी के लिए हार का एक कारण माना जा सकता है।

गोरखपुर सीट 1989 से लगातार गोरखनाथ मंदिर के पास थी। 1989 से 1998 तक योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ यहां के सांसद रहे। उसके बाद से 2014 तक योगी आदित्यनाथ लगातार पांच बार से चुनाव जीते। इतने वर्षों में हार की बात तो छोड़िये केवल दो बार 1998 और 1999 में विपक्ष योगी को चुनौती दे पाया। दोनों बार सपा प्रत्याशी जमुना निषाद ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। 1998 में योगी ने 26,206 वोटों से तो 1999 में सिर्फ 7,339 वोटों से चुनाव जीत पाए। यहाँ एक बात ध्यान रखने की है कि दोनों बार बसपा प्रत्याशी ने क्रमशः 15.23 और 13.54 फीसदी वोट बांट लिया था।

कुल मिला कर गोरखपुर और फूलपुर की हार ने भाजपा आलाकमान के माथे पर सिकन तो पैदा कर ही दिया होगा। जिस सोशल इंजीनियरिंग के बलबूते भाजपा ने पहले केंद्र और फिर बाद में 2017 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनायीं वो सपा-बसपा के गठबंधन से दरकता हुआ दिख रहा है। आम चुनाव के मात्र 10 महीने पहले भाजपा द्वारा 2014 में जीते गए 71 मे से दो सीट का जाना आने वाले वक़्त के लिए पार्टी के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यही नहीं पार्टी की यह हार राजस्थान में हुए उपचुनाव में हार के के बाद मिली है। बिहार में हुए एक लोक सभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी NDA को हार का मुंह देखना पड़ा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा की मोदी-शाह, नए नए बने बबुआ-बुआ के इस नए गठजोड़ की क्या काट निकाल पाते हैं।

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