April 18, 2018
गोरखपुर

जानिये कैसे करें माँ के प्रथम स्वरुप शैलपुत्री की पूजा, कौन से मंत्र से रहेंगे आजीवन निरोग

जानिये कैसे करें माँ के प्रथम स्वरुप शैलपुत्री की पूजा, कौन से मंत्र से रहेंगे आजीवन निरोग

नवरात्र के पहले दिन घट स्थापना कर माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। माँ दुर्गा पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। प्रसिद्द आचार्य मनोज दीक्षित बताते हैं कि पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।

ऐसा है माँ शैलपुत्री का स्वरुप

आचार्य दीक्षित बताते हैं कि आदि शक्ति अपने इस रूप में नंदी नाम के वृषभ पर सवार होती हैं। इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है।। श्री दीक्षित बताते हैं की शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि देवी पार्वती पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थी। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।

अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।’

परन्तु शंकरजी के मना करने पर भी सती को पिता का यज्ञ देखने और माता-बहनों से मिलने की व्यग्रता जरा भी कम नहीं हुई। यह देख शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।

सती जब पिता के घर पंहुची तो उनका घोर अपमान किया आगे। वहां उनसे कोई भी आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। परिजनों के इस व्यवहार से उनको बहुत कष्ट पंहुचा। पिता द्वारा भगवान् शंकर के अपमान से उनका मन क्रोध और क्षोभ से भर गया। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।

वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती,हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं।

माँ शैलपुत्री की पूजा विधि

आचार्य मनोज दीक्षित बताते हैं कि शैलपुत्री की मूर्ति स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। उसके ऊपर केसर से श लिखें। फिर उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। लाल पुष्प हाथ में लेकर शैलपुत्री का ध्यान करें और इस मंत्र ‘ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:’ का उच्चारण कर पुष्प माँ के चरणों में अर्पित कर दें। ऊँ शैलपुत्री देव्यै नम: मंत्र का 108 बार उच्चारण करें। मंत्र पूर्ण होने के बाद अपनी मनोकामना व्यक्त करें और माँ की आरती करें।

माँ को भोग लगाएं

आचार्य दीक्षित बताते हैं कि शैलपुत्री माँ के चरणों में गाय का घी और सफ़ेद बर्फी अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य होने का आशीर्वाद मिलता है और उनका मन और शरीर दोनों ही निरोग रहता है।

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