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GFR DeskNovember 16, 2017
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आयुष द्विवेदी
गोरखपुर: नगर निकाय चुनाव में प्रचार अंतिम समय पर है। सभी प्रत्याशियों ने अपनी-अपनी जीत के दावे करते हुए चुनाव प्रचार के इस आखिरी वक़्त में सब कुछ झोंक दिया है।

जब चुनाव को अब एक हफ्ते का समय बचा है ऐसे में भी Gorakhpur Final Report की टीम प्रत्याशियों के दावे के इतर अपना Reality Check जारी रखे हुए है।

इसी क्रम में आज लोग पहुँच गए है वार्ड नम्बर 38 दिलेकाजपुर में। यहाँ भी नजारा वैसा ही था जैसा अन्य वार्डों में था। गन्दगी, टूटी सड़कें सब यहाँ के लिए भी आम बात ही थी।

स्थानीय लोगों का सीधा आरोप था कि यहाँ के पार्षद पांच साल में काम नही कराया। अपनी तफ्तीश में भी हमने पाया कि इस वार्ड में सड़क, नाली और पानी आदि की समस्या तो है ही इसके अलावा हरिजन बस्ती में सार्वजनिक सौचालय की हालत बदतर है।

यहाँ सफाई कर्मी आता ही नही है। लोगों का आरोप है कि हरिजन बस्ती में जो ट्यूबवेल है उससे खराब पानी आता था लेकिन उस ट्यूबवेल को भी हटाकर दूसरे जगह लगा दिया गया।

पार्षद पद प्रत्याशी साहिल जायसवाल

इस बार के पार्षद पद प्रत्याशी साहिल जायसवाल ने बताया इस वार्ड में 5 साल में कुछ नहीं हुआ है, लोग बहुत नाराज है। उनका कहना था कि लोगों की नाराजगी और गुस्सा मतदान के दिन दिखेगा जब वर्तमान पार्षद को हराने के लिए वोट करेंगे।


GFR DeskNovember 13, 2017
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आयुष द्विवेदी
गोरखपुर: बीते तीन दशक में राजनीति में बहुत बदलाव आये। जमीन से और सामान्य परिवारों से उठकर कई नेताओं ने राज्य और देश का नेतृत्व किया। कांग्रेस के एकाधिकार को इस स्तर पर चुनौती मिली की आज देश की सबसे पुरानी पार्टी का देश के कुछ ही राज्यों पर कब्ज़ा रह गया है।

मुलायम सिंह यादव, मायावती, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों ने बड़ी पार्टियों को ना केवल चुनौती दी बल्कि कुछ जगहों पर तो अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया।

लेकिन जब बात छात्र राजनीति की आती है तो वहां हमें विविधता का जमीनी मुद्दों का अभाव दिखता है। हमारी बात केवल RSS के छात्र संगठन ABVP और कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI तक ही सिमित हो जाती है। बहुत हुआ तो समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन समाजवादी छात्र सभा और वामपंथी संगठन आइसा की बात कर लेते हैं। कहने का मतलब यह है कि अगर NSUI अथवा ABVP से बाहर निकलते हैं तो दूसरे राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों तक बात सिमित हो जाती है।

जाहिर है जब इन्हीं संगठनों की बात लिखी और सुनी जाएगी तो विश्वविद्यालय में चुनाव भी उन्ही मुद्दों पर होंगे जिन मुद्दों पर इनके फ्रंटल आर्गेनाईजेशन लड़ाना चाहेंगे। हम यूनिवर्सिटी की मूल समस्या को भूल चुनाव डोनाल्ड ट्रम्प या अमेरिका, पाकिस्तान या चीन के मुद्दे पर चुनाव लड़ते दीखते हैं।

अभी दिल्ली यूनिवर्सिटी में और JNU में चुनाव हुआ। वहां कैम्पस की समस्या को छोड़ दिया जाए तो सब कुछ होता है जिसको राजनितिक दल मुद्दा बनाते है। इसमें कोई बुराई नहीं है उठाना चाहिए। लोकतंत्र में एक स्वस्थ बहस होनी चाहिए। लेकिन यहाँ हमें समझना चाहिए की हमारे कैम्पस की समस्या डोनाल्ड ट्रम्प या अमेरिका नहीं है।

क्या सचमुच ऐसा ही है। जमीन पर अन्य किसी छात्र संगठन का क्या सचमुच कोई वजूद नहीं है? जी नहीं ऐसा नही है। छात्र संगठनों की दुनिया में इन संगठनों के इतर भी बहुत कुछ होता है जिसे छात्र नेता और उनके दल इग्नोर करते है।

अभी दिल्ली यूनिवर्सिटी में और JNU में चुनाव हुआ। वहां कैम्पस की समस्या को छोड़ दिया जाए तो सब कुछ होता है जिसको राजनितिक दल मुद्दा बनाते है। इसमें कोई बुराई नहीं है उठाना चाहिए। लोकतंत्र में एक स्वस्थ बहस होनी चाहिए। लेकिन यहाँ हमें समझना चाहिए की हमारे कैम्पस की समस्या डोनाल्ड ट्रम्प या अमेरिका नहीं है।

हमारे यूनिवर्सिटी के कैंपस में कैम्पस का ज्वलंत मुद्दा सामने आना चाहिए। छात्र नेताओं को इन मुद्दों को उठाना चाहिए। बड़े मुद्दों के लिए तो हमने सांसद, विधायक पहले ही चुन लिए हैं। इन मुद्दों पर राजनेता प्रेस कॉन्फ्रेंस में या संसद, विधान सभा में तो लड़ते ही हैं। अगर हम भी कॉलेज में यही मुद्दा बनाएंगे तो किस लिए छात्र राजनीति?
इस पर हमें सोचना होगा क्योंकि छात्र नेता इन राजनितिक दलों के फ्रंटल होने के कारण अपने आकाओं के इतर कोई बात उठाना ही नहीं चाहते।

लेकिन सवाल यह है की छात्रों के मुद्दों को उठाएगा कौन? Gorakhpur Final Report ने अपनी तफ्तीश में यह पता लगाने की कोशिश की इन राजनितिक दलों के छात्र संगठनों के आलावा भी क्या कोई ऐसा संगठन है जो केवल छात्र राजनीति करता हो या उसकी बात करता हो। ऐसा ही एक संगठन है राष्ट्रीय विद्यार्थी सभा। इस संगठन का किसी राजनीतिक दल से कोई सम्बन्ध नहीं है।

  (शिव शंकर गौड़)

राष्ट्रीय विद्यार्थी सभा से जुड़े शिव शंकर गौड़ बताते है की हम लोग सिर्फ छात्रों की बात करते हैं, हॉस्टल की समस्या की बात करते हैं। पूर्वांचल पिछड़ा हुआ है, गोरखपुर यूनिवर्सिटी में बहुत दूर-दूर से बच्चे पढ़ने आते है तो हम लोग चाहते है यहाँ सिर्फ पढाई हो अगर इसमें कोई लापरवाही होती है तो हम सवाल उठाते है।

शिवशंकर से यह पूछने पर की आप किसी राजनितिक दल से जुड़े नही है तो संगठन चुनाव कैसे लड़ती है। शिव शंकर बताते है हमारे संगठन से अखिल देव त्रिपाठी विश्वविद्यालय में उपाध्यक्ष बने तो वहीँ महाराणा प्रताप डिग्री कॉलेज जंगल धूसड़ में संगठन के राहुल गिरी अध्यक्ष बने। उन्होंने बताया कि संगठन का धीरे-धीरे पूर्वांचल के अन्य जनपदों में भी फैलाव हो रहा है और एक वक्त आएगा जब की एक संगठन तो ऐसा होगा जो छात्र संघ चुनावों में सिर्फ छात्रों से जुड़े मुद्दों को उठाएगा और उन्ही के दम पर चुनाव जीत कर दिखयेगा।


GFR DeskNovember 13, 2017
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आयुष द्विवेदी
गोरखपुर: हम सब जानते हैं कि राजनीति कोई बच्चों का खेल नहीं है, लेकिन अगर कोई बच्चों के खेल की तरह ही राजनीति करे तो उसे क्या कहा जाए! क्या आज के समय में कोई ऐसा शख्श है जिसकी राजनीति ना केवल अप्रत्याशित हरकतों से भरी हो बल्कि उसमे हास्य, व्यंग, दुःख-दर्द के साथ-साथ समाज पर चोट करने का भी पुट हो।

जी हाँ एक व्यक्ति है ऐसा। कहीं दूर जाने की जरुरत नहीं है। वो हमारे बीच का ही है हमारे अपने शहर से ही है। नाम है राजन यादव। शायद आप पहचान नहीं पाए होंगे। उनका असली नाम हम आपको बताते हैं। वो हैं ‘अर्थी बाबा’. जी हाँ अब वो माँ-बाप के दिए नाम से कम और इसी अर्थी बाबा के नाम से ज्यादा पहचाने जाते हैं।

अर्थी बाबा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। कम से कम अपने शहर गोरखपुर में तो बिलकुल नही। राजनीति में सुचिता के पैरोकार अर्थी बाबा अपने उलजुलूल कामों के लिए हर किसी का ध्यान अपनी और आकर्षित करते हैं। चौकिएगा मत जब कभी वो अपना प्रचार-प्रसार अर्थी पर बैठकर करने लगे, या कभी वो मरे हुए लोगों को अपने हिसाब से जिन्दा करके पोलिंग एजेंट बना दें। जी हाँ यही खास बात है राजन यादव उर्फ़ अर्थी बाबा की। लब्बोलुआब यह है कि अर्थी बाबा उठाते तो ज्वलंत मुद्दे ही हैं बस उसका तरीका और अंदाज जुदा होता है।

अर्थी बाबा के काम करने के तरीक़े को जानने से पहले हम उनके निजी जीवन के बारे में बताते हैं। फुर्सत के वक़्त में Gorakhpur Final Report से हुई बातचीत में अर्थी बाबा बताते है की एयरफोर्स नंदानगर से प्राथमिक पढाई की उसके बाद उन्होंने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से MBA किया। पढाई में अर्थी बाबा काफी ठीक थे इसीलिए इनका सलेक्शन ट्रेड आयल कंपनी दमन में हुआ, अच्छे पैकेज पर।

अर्थी बाबा ने लेकिन नौकरी छोड़ दी क्योंकि उनके ऊपर तो राजनीति और करप्सन हटाने का धुन जो सवार था। अर्थी बाबा बताते है कि घर वाले अभी ही चाहते हैं कि वो राजनीति छोड़ दें और नौकरी ज्वाइन कर लें। लेकिन उनका सोचना कुछ और ही है। अर्थी बाबा कहते हैं की वो देश के गरीबों को कैसे छोड़ दें जो इनसे इतना उम्मीद लगाए बैठे हैं।

जरा उनके विरोध प्रदर्शनों पर नजर डालते हैं
–अर्थी बाबा ने प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अनूठा विरोध प्रदर्शन किया।
— 34 दिन काले धन के खिलाफ अनशन करते हुए राप्ती नदी में बैठे रहे
— पुलिस के खिलाफ लोग आंदोलन करते है तो वही अर्थी बाबा ने पुलिस लाइन में जर्जर भवन और कम वेतन का आवाज उठाते रहे है।

अर्थी बाबा बताते है की WHO के मानक के अनुसार कोई काम नहीं हो रहा है। मानक के अनुसार 2000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में 20 हजार पर एक डॉक्टर है। अर्थी बाबा पीएम मोदी से भी बहुत नाराज है।

उनका कहना है कि,”उज्जवला योजना मेरे संघर्ष का नतीजा है क्योंकि मैंने ‘चूल्हा हटाओ, गैस लाओ’ का नारा दिया लेकिन मोदी जी ने उस योजना का नक़ल करके उज्ज्वला योजना में तब्दील कर दिया।”

अर्थी बाबा GST से भी काफी परेशान दिखे। उनका कहना था कि स्टेफ्री पर टेक्स बढ़ाने से गरीब महिलाएं इसे खरीद नहीं पायेगी और इससे केंशर का खतरा है। अर्थी बाबा बताते है की सरदार नगर चीनी मिल में किसानों के पैसे बकाया को लेकर चौरी चौरा तहसील में 50 दिनों तक धरना दिया। उनकी सबसे बड़ी लड़ाई इस समय पॉल्यूशन है और इसके खिलाफ वह पूरे देश में एक माहौल बनाना चाहते है।

अर्थी बाबा ने चुनावों में एक भी रूपया ना खर्च कर के एक अनूठा रिकार्ड बनाया है। अर्थी बाबा अभी तक 4 बार विधायक, 3 बार एमएलसी और 3 बार संसदीय चुनाव सहित अब तक 11 चुनाव लड़ चुके हैं। बाबा राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ना चाहते थे लेकिन दिक्कत यह हो गई की कोई भी विधायक या जनप्रतिनिधि इनका गवाह नही बना इसलिए पर्चा ख़ारिज हो गया।

Gorakhpur Final Report से बात करते हुए अर्थी बाबा ने बताया कि उनका अगला टारगेट गोरखपुर लोक सभा सीट के लिए होने वाला उपचुनाव है। उन्होंने कहा की उसके बाद एकमात्र उद्देश्य भाजपा सांसद मनोज तिवारी के खिलाफ दिल्ली से चुनाव लड़ कर उन्हें हराना है।

जब अर्थी बाबा से हमने यह सवाल किया कि आप अर्थी का ही क्यों सहारा लेते है लोकतंत्र में विरोध के तो और भी कई तरीके हैं पर बाबा का जवाब था की नेताओं की आत्मा मर चुकी है। भ्रष्ट नेता गरीबों की नही सुन रहे हैं जिसके कारण बहुत सारे लोगों की मौत हो जा रही है। मैं अर्थी के माध्यम से मरे हुए लोगों की आत्मा को जगाता हूँ और उन्हें बताने की कोशिश करता हूँ की अभी भी कोई है जो आपकी लड़ाई लड़ रहा है।


GFR DeskNovember 12, 2017
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नितीश गुप्ता
गोरखपुर: हर साल की तरह इस साल भी शहर के टाउनहॉल में तिब्बती मार्केट नए वैरायटी के गर्म कपड़ों के साथ सज चुकी है।

आपको बताते चले कि तिब्बती मार्केट से हर साल स्वेटर, जैकेट आदि खरदीने के लिए शहर के लोग भारी मात्रा में आते हैं। हर साल नवंबर माह से फरवरी माह तक लगने वाला यह मार्किट काफी प्रसिद्ध है और दूर-दूर से लोग यहाँ गर्म कपड़ों की खरीदारी के लिए आते हैं।

यह मार्केट शहर में पिछले 40 साल से लग रहा है। यहाँ पर कुछ दुकानदार देश के उत्तर पूर्वी राज्यों से आते हैं तो वहीँ कुछ तिब्बत, नेपाल से भी आकर यहाँ अपनी दुकान सजाते हैं। यहाँ चार महीने की कमाई के बाद ये लोग वापस में प्रदेश, देश जा कर मजदूरी कर के अपना जीवन यापन करते है।

Gorakhpur Final Report की टीम ने जब एक दुकानदार से बात की तो उसका कहना था वो पिछले दो दशक से यहां दुकान लगा रहा है और काफी लोग यहां आते है।

उन्होंने बताया कि पहले तो कपड़ो पर यहाँ कुछ छूट दी जाती थी लेकिन कुछ वर्ष पहले यहाँ छूट को लेकर कुछ लोगों ने मारपीट कर ली थी जिसके बाद यहां रेट फिक्स कर दिया गया।

एक और दुकानदार पूनी से जब हमने बात की तो उसने बताया कि इधर ठंड ज्यादा रहने की वजह से तिब्बती मार्किट में लोगो की भीड़ लगी रहती है। वहीँ जब हमने खरीदारी कर रहे कुछ ग्राहक से बात की तो उनका कहना था तिब्बती मार्किट में अच्छे गर्म कपड़े सही रेट पर मिल जाते है।


GFR DeskNovember 11, 2017
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नितीश गुप्ता
गोरखपुर: देखा जाए तो पिछले दोनों निकाय चुनाव में बीजेपी ने ही अपना परचम लहराया है, परन्तु फिर भी गोरखपुर के सभी वार्डो की हालत बहुत ही बेकार है। Reality check के क्रम में जब Gorakhpur Final Report की टीम वार्ड 59 (हाँसुपुर) में पहुँची तो आलम यह था की वार्ड की हालत वाकई दयनीय दिखी।

वार्ड के तमाम नागरिकों का कहना था कि पिछले सभासद ने कोई काम नही किया। सडकों पर हर जगह फैला कूड़ा, गन्दी, सडकों पर घूमते आवारा पशु इस बात की ताकीद भी करते हैं कि यहाँ के जनप्रतिनिधि ने इस वार्ड पर ध्यान नहीं दिया।

लगभग 8000 मतदाता वाले इस वार्ड के लोगो ने हमसे बात करते कहा कि वार्ड में हमेशा पानी की दिक्कत रहती है। सडकों पर सुअर घूमते रहते है जिनसे बीमारियां फैलती है, नालियों का पानी सड़को पर फैला रहता है। सड़को पर कूड़े पड़े रहते है।

 (निर्दलीय पार्षद प्रत्याशी मोहम्मद कैश)

वार्ड से निर्दलीय पार्षद प्रत्याशी मोहम्मद कैश ने बताया कि अगर वो चुनाव जीतते है तो उनकी पहली प्राथमिकता वार्ड में हर चौराहे पर शुद्ध पानी की टँकी लगवाना तथा सफाई पर ध्यान देंगे।

आपको बता दें कि मोहम्मद कैश वार्ड के लिए पिछले कई वर्षों से निस्वार्थ भाव से काम करते आये है। उन्होंने वार्ड में निशुल्क पियाऊ की व्यवस्था कराई साथ ही समय समय पर निशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन भी किया है।

मोहम्मद कैश पिछले कई वर्षों से सपा के कार्यकर्ता हैं और इस समय जिला के सचिव भी हैं। वार्ड नंबर 59 के युवाओं को भरोसा था कि सपा का टिकट मोहम्मद कैश को ही मिलेगा परंतु टिकट ना मिलने से युवा वर्ग काफी निराश है। मोहम्मद कैश ने Gorakhpur Final Report से बात करते हुए बोला कि वह समाजवादी पार्टी के लिए हमेशा ही दिल से काम करते आए हैं और करते रहेंगे।


GFR DeskNovember 8, 2017
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राकेश मिश्रा/हरिकेश सिंह
गोरखपुर: अगर मोहन दास करमचंद गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से नहीं फेंका गया होता तो शायद हमें राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी नही मिलते। वैसे ही यदि आज से चार दशक पूर्व एक रिश्तेदार के पत्नी की बात पेशे से बैंकर रवि द्विवेदी को नहीं चुभती तो शायद हमारे अपने शहर गोरखपुर को ‘मिस्टर बोनसाई’ नहीं मिलते।

आज हम बात कर रहे हैं गोरखपुर के मिस्टर बोन्साई रवि द्विवेदी की जिन्होंने अकेले अपने दम पर वो काम कर दिखाया है जो देश-प्रदेश की सरकारें लाखों-करोड़ो खर्च करने के बाद भी नहीं कर पाए हैं।

पूर्वांचल बैंक के अधिकारी रवि द्विवेदी ने अपने आस-पास के समूचे पर्यावरण को ही बदल कर रख दिया है। अपने जिले में रहने वाले मिस्टर बोनसाई पेड़-पौधों से बहुत लगाव की वजह से अपने घर के कोने-कोने में पौधे लगाए हैं। उनके घर में चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखती है। उन्‍होंने अपने घर में 600 से अधिक फल-फूल के दुर्लभ और औषधीय पौधे लगाए हैं।

महानगर के गोरखनाथ क्षेत्र के दस नम्बर बोरिंग निवासी मिस्टर बोनसाई के नाम से ख्यातिलब्ध रवि द्विवेदी को यह जूनून 40 साल पहले चढ़ा। Gorakhpur Final Report से बात करते हुए रवि बताते हैं कि वह वर्ष 1977-78 के दौरान एक दोस्त के साथ जयपुर गए हुए थे। वहां पर उनके एक रिश्तेदार की पत्नी ने बोनसाई विधि से सात-आठ पौधे गमले में लगाए हुए थे। जब उन्होंने भी इसके बारे में जानने के लिए उनसे बात की, तो उन्होंने इसके बारे में बताने से इंकार कर दिया।

उन्होंने रवि से कहा कि ये उनके बस की बात नहीं है। यह केवल पेड़-पौधे नहीं हैं। हर पेड़-पौधों के भीतर एक संदेश और कला छुपी हुई है। ये बात रवि को भीतर तक चुभ गई। उसके बाद से ही उनके भीतर बोनसाई की पूरी बगिया लगाने का जो जज्बा आया तो देश के कोने-कोने घूमकर मनचाहे पौधों को लेकर अपनी छोटी सी बगिया में उगाकर उन्होंने इसे चरितार्थ भी कर दिखाया।

रवि बताते हैं कि जब वो महिला वर्ष 1992 में उनके घर गोरखपुर आईं तो हैरत में पड़ गईं। आखिरकार रवि ने वह कर दिखाया था जो वह महिला सपने में भी नहीं सोची थीं।

आज उनकी मेहनत रंग ला चुकी है। आज उनके छोटे से गमले में 38 सालों का बरगद मुस्कुरा रहा हैं। पास में 29 साल का पीपल भी खुश नजर आ रहा हैं। इसके अलावा कॉफी, तेजपत्ता, साइकस, पाकड़, गुलमोहर, शहतूत, करौंदा,गूलर,इमली,गुड़हल, कनेर,अमलतास, मनोकामिनी और बांस आदि के बड़े दरख्त गमलों मे देख सभी आश्चर्यचकित होते हैं और होना भी स्वभाविक है।

कुल मिला कर आपको यह बतादें कि 1976 से लगी ये बोनसाई बगिया आज अपने पुरे शबाब पर हैं। बड़े दानों का रुद्राक्ष और ब्लैक पाइन सहित 600 प्रकार के फल, फूल और औषधीय पौधे किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींचने में सक्षम हैं। इनमे 175 से ज्यादा पौधों की प्रजातियां दिलचस्प हैं।

बात करें इस बोनसाई बगिया के रचनाकार की तो प्रकृति के भक्त रवि द्विवेदी बैंक अधिकारी हैं। उनका मकसद शौक पूरा करना नहीं बल्कि लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरुक करना भी हैं। प्राकृतिक आपदाओं के लिए वनों के घटते क्षेत्रफल व वनों के दोहन को मुख्य कारण बताते हुए रवि कहते हैं कि हमारी जिंदगी तो गुजर जायेगी, लेकिन आने वाली पीढियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। जिनके पास जमीन है वह दो तीन पेड़ जरुर लगायें ताकि प्रकृति की विलुप्त हो रही प्रजातियों को संरक्षित एवं सुरक्षित रखा जा सकें।

उन्होंने कहा कि बोनसाई के लिए यह क्षेत्र मुफीद है। राजस्व बढ़ाने का जरिया बन सकता हैं। बुद्धा सर्किट की वजह से लाखों बुद्धिस्ट यहां आते है।उन्हें बोनसाई से बेहद मोहब्बत हैं। इसलिए सरकार को भी कोई ठोस योजना बनाकर उसे अमलीजामा पहनाना चाहिए ताकि राजस्व, रोजगार और सबसे अहम पेड़ पौधों के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ाई जा सके।

बोनसाई मूल रूप से जापान और चीन का पौधा है। जापानी भाषा में बोनसाई का मतलब है “बौने पौधे”। यह काष्ठीय पौधों को लघु आकार किन्तु आकर्षक रूप प्रदान करने की एक जापानी कला या तकनीक है। इन लघुकृत पौधों को गमलों में उगाया जा सकता है। इस कला के अन्तर्गत पौधों को सुन्दर आकार देना, सींचने की विशिष्ट विधि तथा एक गमले से निकालकर दूसरे गमले में रोपित करने की विधिया शामिल हैं। इन बौने पौधों को समूह में रखकर घर को एक हरी-भरी बगिया बनाया जा सकता है। बोनसाई पौधों को गमले में इस प्रकार उगाया जाता है कि उनका प्राकृतिक रूप तो बना रहे लेकिन वे आकार में बौने रह जाएं। बोनसाई को पूरे घर में कहीं भी रखा जा सकता है।

आजकल बोनसाई लगाना अब हमारे यहाँ भी लोगों का फैशन बन गया है। नाते-रिश्तेदारों का यहाँ हमें इक्के दुक्के बोनसाई पौधे देखने को मिल तो जाते हैं लेकिन इन पौधों का पूरा एक संसार देखना और वो भी अपने मूल देश से बाहर निश्चित ही एक अनूठा दृश्य है।

श्री द्विवेदी ने अपनी बगिया को एक बेहतर निखार देने के लिए पौधों की तलाश में पूरे देश का भ्रमण किया। जिसमे बरगद, पीपल की प्रजातियां यूपी के कई शहरों से ले आए तो केरल से कॉफी, राजस्थान से गूलर, बबूल और बंगाल से इमली व जामुन। पतंनगर से डेनियम मंगाया। उनके इस कार्य में उनकी बैंक अधिकारी पत्नी ब्रिज मोहिनी का भी कदम-कदम पर साथ मिला।

यूं तो रवि द्विवेदी पेशे से पूर्वांचल बैंक में अधिकारी हैं।पेड़-पौधों को ही वो अपने औलाद स्वरूप मानते हुए वह सुबह और शाम दो-दो घंटे उनकी सेवा में ही बिताते हैं।हालांकि रवि के पास ज्यादा जमीन तो नहीं है। लेकिन यह उनका जज्बा ही है कि वह इतने सालों से बोनसाई विधि से पेड़ों की सेवा करने के कारण उनको चाहने वाले उन्हें मिस्टर बोनसाई के नाम से ही पुकारते हैं।

वह आज की पीढ़ी के युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि बिल्डिंग और मॉल बनाना तो आसान है, लेकिन जरा एक पेड़ तो बनाकर दिखाओ। एक दिन में यह काम नहीं हो सकता। वह यह भी कहते हैं कि हर किसी को एक परिवार-एक पेड़ के फार्मूले को अपनाना चाहिए। वह कहते हैं कि उनके लिए तो हर दिन पर्यावरण दिवस है। साल में एक बार दिखावे के लिए इस तरह के कार्यक्रम करने से अच्छा है कि हरितवर्ष मनाया जाना चाहिए।

आपको बता दें की रवि द्विवेदी की बोनसाई बगिया अपने देश की राजधानी दिल्ली के लोधी गार्डन में लगे बोनसाई गार्डन से कही ज्यादा सुन्दर और विस्तृत है। बोनसाई बगिया के अनूठे पुजारी रवि ने अपने जज्बे से जहां प्राकृतिक आपदाओं के प्रति लोगों को सचेत करने का प्रयास किया है। तो वहीं पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के संदेश के साथ वह सभी के लिए एक नजीर भी हैं।

 


GFR DeskNovember 8, 2017
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गोरखपुर: रोटरी क्लब प्राथमिक विद्यालय नगर क्षेत्र शिवपुर साहबाजगंज गोरखपुर की प्रधानअध्यापिका कक्षा में फेस मसाज करते हुए मोबाइल में कैद हो गई। अचानक स्कूल पहुंचे अभिभावक ने अपने मोबाइल में अध्यापिका का न केवल वीडियो बना लिया।

प्रधानअध्यापिका ने अपने कृत्य पर तर्क दिया कि उनके पास खाली वक्त था, इसलिए फेस मसाज करा लिया।

सोमवार को शिवपुर साहबाजगंज स्थित रोटरी क्लब प्राथमिक विद्यालय नगर क्षेत्र की प्रधानअध्यापिका ने निकट के ब्यूटी पार्लर का काम करने वाली महिला को स्कूल में ही काल कर बुला लिया। वह स्कूल की कक्षा में ही अपना फेस मसाज करा रही थी जबकि कक्षाओं से निकल कर बच्चे बाहर खेल रहे थे।

कुछ बच्चे बार-बार कमरे में झांक रहे थे। इस दौरान स्कूल के निकट से गुजर रहे अभिभावक का ध्यान हो रहे शोरगुल ने खींचा। उसके बच्चों को ताक झांक करते देख उत्सुकता से पूछताछ की। बच्चों ने खुलासा किया कि मैडम अपना फेस मसाज करा रही है।

अभिभावक ने अपना मोबाइल आन किया और कक्षा में प्रवेश कर गया। उसके प्रधान अध्यापिका से पूछा कि यह आप क्या रही हैं? फेस मसाज करा रही प्रधान अध्यापिका ने स्वयं को प्रिंसिपल बताते हुए वीडियो डिलीट करने का दबाव बनाया। सफाई दी कि खाली वक्त था इसलिए फेस समाज करा लिया। इसके बाद भी उन्होंने फेस मसाज कराना बंद नहीं किया।

मैडम से जब पूछा गया की आप विद्यालय में मसाज करा रही थी, तो उन्होंने एक सिरे से इस बात को नकार दिया, और उन्होंने कहा की नहीं आपको मेरे चेहरे को देख कर लग रहा है, की मैने मसाज कराया है, कुछ नहीं लगा था, झुठ बोल रही है, और संगीता सिंह मुझे फसा रही है, वो यहा की हेड बनना चाहती है।

मौजूद टीचर संगीता सिंह जिन पर फसाने का आरोप लगाया प्रधान अध्यापिका आने उनकी माने तो मै कल पेपर ले रही थी, और ये क्या करा थी, क्या नहीं वो वाला कमरा है, यहा की पब्लिक ने ये फोटो ली है, ये फ्रेसिअल करा रही थी, यहा की जो दाई है, उससे हमेसा कराती है, और यहा की दाई सिर्फ उन्ही के लिए है ही, वो कोई काम नहीं करती है, वो सिर्फ इनके लिए है, जब फोटो लेकर वो गया और फिर बात सामने आई, तो मुझे पता चला।


GFR DeskNovember 7, 2017
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राकेश मिश्रा
गोरखपुर: सावधान हो जाइए, यदि आप जनहित में किसी बात को उठा रहे हैं और उस पर सूबे की योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ कुछ लिख, बोल रहे हैं तो आप के खिलाफ केस भी दर्ज हो सकता है।

ऐसा ही हुआ है गुआक्टा के जोनल सेक्रेटरी और विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ राजेश चंद्र मिश्र के साथ। श्री मिश्रा ने सरकार की आलोचना करते हुए एक मैसेज व्हाट्स एप्प पर फॉरवर्ड कर दिया। बस फिर क्या था उनके पास इलाहाबाद के साइबर सेल से फ़ोन आया की उनके खिलाफ इलाहाबाद में साइबर कानून के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

फ़ोन करने वाले ने बताया कि सरकार के खिलाफ आपने जो व्हाट्स एप्प मैसेज भेजा है उसके कारण आपके खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है।

जब राजेश मिश्रा ने फ़ोन करने वाले अधिकारी से यह पूछा की कृपया आप मुझे बताएं की मेरे खिलाफ किसने शिकायत की है तो उन्होंने बताने से इंकार कर दिया। सबसे बड़ी हास्यास्पद बात तो यह है कि फ़ोन करने वाले अधिकारी ने वो व्हाट्स एप्प मैसेज भी भेजने से इंकार कर दिया जिसके कारण इनके खिलाफ शिकायत दर्ज की गयी है। अधिकारी का कहना था कि अगर उसने यह मैसेज राजेश मिश्रा को फॉरवर्ड किया तो वह खुद एक आरोपी बन जायेगा।

अब जरा सोचिये की जब पुलिस अधिकारी यह कह रहा है कि अगर वो मैसेज फॉरवर्ड करेगा तो आरोपी बन जायेगा तो इस सरकार में आम आदमी की क्या हालत होगी।

जब इस बाबत इस संवाददाता ने राजेश मिश्रा से बात की तो उनका कहना था कि मेरे खिलाफ यदि कोई आरोप बनता है तो सरकार मुझे जेल में डाल दे या फांसी चढ़ा दे लेकिन इस प्रदेश में सिस्टम को सही करवा दे। उनका कहना था कि देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गए लेकिन अभी तक कोई सिस्टम नहीं बन पाया।

उन्होंने पूछा की आखिर क्या कारण है अभी तक कोई सिटीजन चार्टर नहीं बन पाया और जो नीतियां बनी भी हैं उनको जिम्मेदारी से लागु क्यों नहीं करवाया जा रहा है? उनका कहना था कि सरकार को चाहिए की हर काम के लिए कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करे और यदि कोई कर्मचारी या अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है तो उसके खिलाफ शख्त से शख्त कार्यवाही की जाये।

राजेश मिश्रा के जिस पोस्ट पर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है उसको हम यहाँ अपने पाठकों के लिए पोस्ट कर रहे हैं जिससे आप सभी भी सावधान हो जाएँ कि सरकार के खिलाफ जनहित की कोई बात कहने या लिखने से आपके खिलाफ भी केस दर्ज हो सकता है।

पोस्ट है

”योगी जी,
कुछ करिये
यूपी हाइकोर्ट के 3 जजो के फैसले से जो भी कार्यवाहक प्राचार्य का कार्य करेंगे उसे प्राचार्य का स्केल 10000 agp के साथ मिलेगा।इसी निमित दिनाँक 30 अप्रेल 2017 को कार्यवाहक प्राचार्य डॉ रामअवध सिंह यादव,कार्यवाहक प्राचार्य श्री गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,मालटारी,आजमगढ़ सभी वांछित प्रपत्रों को निदेशालय प्रेषित किया।जब माह भर बाद डीलिंग क्लर्क श्री सन्त राम से सम्पर्क किया तो उसने इस कार्य के लिये 10 हजार रुपये की रिश्वत की मांग की।जब उन्होंने इसे देने से मना किया तो उसका कथन था कि इस 10 हजार में सबका हिस्सा है।अंततः थक हार कर 6 माह बाद रुपया 8000 पर वह माना।जो उसे देने को यादव जी बाध्य और मजबूर हो गए।अंततः कल उसे 8000 रुपया वह भेज रहे है।जन सामान्य में यह आम चर्चा है कि अखिलेश यादव की तुलना में योगी सरकार में रिश्वत की दर दुगुनी हो गई है।कृपया इसे संज्ञान में लेकर सरकार की क्षवि को धूमिल होने से बचावे।”


GFR DeskNovember 6, 2017
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संदीप त्रिपाठी
गोरखपुर: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मेयर पद के प्रत्याशी सीताराम जायसवाल ने कहा है कि यदि जनता मुझे चुनती है तो पांच वर्षों का मेरा कार्यकाल गोरखपुर नगर निगम के इतिहास में ‘गोल्डन कार्यकाल’ होगा।

Gorakhpur Final Report से बात करते हुए सीताराम जायसवाल ने कहा कि पूर्व में बीजेपी के मेयर शहर में रहे हैं लेकिन केंद्र व प्रदेश में भाजपा की सरकारें ना रहने से उनको कार्य करने में काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

श्री जायसवाल ने कहा कि कठिनाइयों के बावजूद पूर्व के भाजपा में मेयर ने बेहतर कार्यकाल दिया। अब सूबे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं और देश का प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी हैं, और दोनों नेता विकास के रास्ते पर निकले हुए हैं इसलिए यदि मुझे सेवा का मौका मिला तो मेरा कार्यकाल विकास के स्वर्णिम अक्षरों में गिना जाएगा।

बिहार के छपरा जिले के रिवेलगंज में सरकारी विद्यालय में अध्यापक रह चुके श्री जायसवाल ने सन 1975 में पारिवारिक विभाजन के कारण नौकरी छोड़ दी और गोरखपुर चले आये। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज इससे पहले गोरखपुर में सन 1857 से रहते थे, जब चांदी के सिक्के से व्यापार होता था घोड़ा गाड़ी से जंगलों के रास्ते चला जाता था।

गोरखपुर शहर के लालडिग्गी के पास खूनीपुर मोहल्ले के मूलनिवासी सीताराम जायसवाल ने 2 फरवरी 1979 को ब्याहुत ट्रेडर्स के नाम से किराना व्यापार में कदम रखा।
श्री जायसवाल ने 15 साल पहले अपने बेटों को सारा कारोबार सौंपकर व्यापार उनके ऊपर छोड़ दिया और पहले से शिक्षा जगत में रुझान होने के कारण फिर से शिक्षा जगत की तरफ कदम बढ़ाया और सन् 2007 में संस्कृति पब्लिक स्कूल की नीव रखी।

शहर के दर्जनभर संगठनों से जुड़ते हुए समाज हित और व्यापार हित की आवाज उठाने वाले श्री जायसवाल ने कहा कि उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है की गोरखपुर में फिल्म सिटी की स्थापना हो।

श्री जायसवाल ने कहा कि चुनाव जीतने के बाद उनकी पहली प्राथमिकता गोरखपुर को जलजमाव से मुक्ति दिलाना रहेगा। संयुक्त व्यापार मंडल के अध्यक्ष सीताराम जायसवाल ने कहा कि गड्ढा मुक्त सड़कों का निर्माण और एक बेहतर कूड़ा निष्पादन प्रणाली इस शहर की आज सबसे बड़ी जरुरत है। उन्होंने कहा कि मेयर बनने के बाद वो इन कार्यों को पूरा करने के लिए त्वरित कदम उठाएंगे।

सीताराम जायसवाल ने कहा कि उनकी चौथी बड़ी प्राथमिकता इस शहर के अंतिम व्यक्ति तक शुद्ध पेयजल पंहुचाना होगा। उन्होंने कहा कि मेयर बनने के बाद जो मूलभूत सुविधाएं स्मार्ट सिटी के लिए होनी चाहिए सर्वप्रथम उन सुविधाओं को गोरखपुर में स्थापित करके महानगर को भी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया जाएगा।

यह पूछने पर कि क्या साबरमती रिवर फ्रंट या गोमती रिवर फ्रंट के जैसे राप्ती रिवर फ्रंट की भी कल्पना की जाए पर उन्होंने कहा कि बिल्कुल यह खुद उनकी सोच है की राप्ती को एक सुन्दर पर्यटन स्थल के रूप की जाए। उन्होंने बताया कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जब गोरखपुर में एक कार्यक्रम में आये थे तभी उन्होंने कहा था कि राप्ती को जलमार्ग के रूप में परिवर्तित करके व्यापार को सुगम बनाया जाएगा वह इसके विकास का मार्ग प्रशस्त किया जाएगा।

यह पूछने पर की क्या BJP में आप के उम्मीदवारी को लेकरकोई विरोध है पर सीताराम जायसवाल ने कहा कि कोई विरोध नहीं है सब लोग साथ हैं सब लोग चुनाव में भरपूर सहयोग करने के लिए तैयार हैं।

Gorakhpur Final Report के यह पूछने पर की क्यों ना गोरखपुर में E पार्किंग की व्यवस्था की जाए ताकि ज्यादा पार्किंग शुल्क से जनता को बचाया जा सके पर श्री जायसवाल ने कहा कि आपका यह प्रश्न स्वागत योग्य है और हम चुनाव जीतने के बाद इस बारे में सबसे पहले पहल करेंगे।


GFR DeskNovember 4, 2017
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राकेश मिश्रा/आयुष द्विवेदी
गोरखपुर: आज गोपाष्टमी है। वर्तमान पीढ़ी को शायद ही पता हो कि 7 नवंबर 1966 को गोपाष्टमी के दिन एक ऐसी घटना घटी थी जिसका सीधा सम्बन्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री कांग्रेस पार्टी की इंदिरा गाँधी, करपात्री महाराज और गोवध रोकने के वादे से सीधा सम्बन्ध था। इसका एक सम्बन्ध गोरखपुर से भी था। वो सम्बन्ध ऐसे था की जब पुरे देश की मीडिया गोपाष्टमी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी की निहत्थे साधुओं पर गोली चलवाने को लेकर चुप थी तब गोरखपुर से निकलने वाली कल्याण पत्रिका ने इंदिरा दमनकारी रूप की धज्जियाँ उड़ायी थी।

हालांकि उस घटना पर कई हिंदूवादी, दक्षिणपथी और वामपंथी संगठनों के अपने-अपने दावे तो बहुत हैं लेकिन हकीकत यह है कि उस घटना के बारे में बहुत लिखा-पढ़ा गया नहीं। कारण प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का खौफ।

जब हमने इसकी पड़ताल करने की कोशिश की तो हमें कहीं दूर जाने की जरुरत नहीं पड़ी क्योंकि उस घटना की जड़ें हमलोगों ने अपने शहर गोरखपुर में ही पाया।

कहते हैं कि उस समय चुनाव जीतने के लिए इंदिरा गांधी संतों की शरण में गई थी। इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था लेकिन करपात्री महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती।

इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्लखाने बंद हो जायेगें। जो अंग्रेजों के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी चुनाव जीतने के बाद अपने वादे से मुकर गयी।

प्रसिद्द समाजसेवी हनुमान प्रसाद पोद्दार के करीबी हरी कृष्ण दुजारी बताते हैं कि मई से ही आंदोलन की रुपरेखा तैयार हो गयी थी, जिसकी जिम्मेदारी कल्याण पत्रिका के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार ने उठाया था। बाद में देश के सभी साधु संत का इकठा होना शुरू हुआ और 7 नवम्बर को शांति प्रिय तरीके से आंदोलन की रुपरेखा बनी।

उन्होंने बताया कि आंदोलन में जैन धर्म के मुनि सुशील, करपात्री महाराज, तत्कालीन गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और हजारों साधु शंत जुटे थे। इंदिरा गांधी की सरकार थी। उस समय के गृह मंत्री अतुल्य घोष ने उस शांति पूर्वक आंदोलन को दबाने के लिए गोली चलवा दी जिसमे सैकड़ो निहत्थे साधुओं की मौत हो गई।

उन्होंने बताया कि उस घटना के बाद देश में एक भयंकर अशंतोष उत्पन्न हो गया तह। संत प्रभुदत्त ब्रम्हचारी और गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य निरंजन आमरण अनशन पर बैठ गए लेकिन इंदिरा गांधी की कूटनीति ने उस आंदोलन को समाप्त कर दिया।

श्री दुजारी बताते हैं कि उस आंदोलन का प्रभाव इतना ज्यादा हो गया था कि लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, इसके लिए स्पेशल ट्रेनें चलायी गयी। 1966 में 32 करोड़ रुपयों की लागत से जो कसाई खाना बना था उसमें हजारो पशु रोज मारे जाते थे लोगो में भयंकर असंतोष था।

उन्होंने बताया कि इस बात का विरोध करने के लिए उस समय विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के माइक सँभालते ही उसका तार काट दिया गया और उसके बाद आशु गैस के गोले छोड़े गए। उस आंदोलन में हनुमान प्रसाद पोद्दार बाल-बाल बच गए थे और फिर गोलियो और आशु गैस के गोले से पूरा मैदान धुंआ में तब्दील हो गया ।

उन्होंने बताया कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों के इस मांग को ठुकरा दिया, जिसमें सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी, तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी, जिसे ”गोपाष्टमी” भी कहा जाता है ।

धरने में शामिल मुख्य संतों में से एक रामचन्द्र वीर निहत्थे और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवाने के विरोध में अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था।

आपको बता दें देश के ज्यादातर अख़बारों ने किसी भी अखबार ने इंदिरा के डर से साधुओं पर गोली चलने और रामचंद्र वीर के बलिदान की खबर छापने की हिम्मत नहीं दिखायी। वो हिम्मत सिर्फ गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका “कल्याण” ने “गौ अंक में एक विशेषांक ” जिसका शीर्षक ‘गो हत्या निरोध’ था को प्रकाशित किया था। जिसमे विस्तार सहित यह घटना दी गयी थी।

हरि कृष्ण बताते है कि जहाँ इंदिरा सरकार ने आंदोलनकारियो को उपद्रवी कहा तो वही उस समय के विदेशी मीडिया में भारत की बहुत किरकिरी हुई। उन्होंने बताया कि अटल बिहारी जब मंच पर बोल रहे थे और उस समय गोली चलवाना यह दर्शाता है कि गोली सिर्फ साधु संतों पर नहीं चली थी बल्कि विपक्ष के नेता अटल बिहारी बाजपेई को भी टारगेट किया गया था ताकि इस आंदोलन के साथ ही साथ देश में पहली बार उठ रहे विपक्ष के आवाज को भी दबा दी जाये।

 

 


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